- जनहित याचिका भारतीय कानून में, सार्वजनिक हित की रक्षा के लिए मुकदमे का प्रावधान है।
- जनहित याचिका अन्य सामान्य अदालती याचिकाओं से अलग, इसमें यह आवश्यक नहीं की पीड़ित पक्ष स्वयं अदालत में जाए।
- जनहित याचिका किसी भी नागरिक या स्वयं न्यायालय द्वारा पीडितों के पक्ष में दायर किया जा सकता है।
जनहित याचिका भारतीय संविधान या किसी अन्य कानून में परिभाषित नहीं है।
जनहित याचिका उच्चतम न्यायालय के संवैधानिक व्याख्या से व्युत्पन्न है, इसका कोई अंतर्राष्ट्रीय समतुल्य नहीं है और इसे एक विशिष्ट भारतीय संप्रल्य के रूप में देखा जाता है।
जनहित याचिकाओँ का विचार अमेरिका में जन्मा। वहाँ इसे 'सामाजिक कार्यवाही याचिका' कहते है।
भारत में जनहित याचिका पी.एन.भगवती ने प्रारंभ की थी।
जनहित याचिका न्यायपालिका का आविष्कार तथा न्यायधीश निर्मित विधि है।
जनहित याचिकाएँ जनहित को सुरक्षित बढाना चाहती है।
जनहित याचिका लोकहित भावना पे कार्य करती हैं। ये ऐसे न्यायिक उपकरण है जिनका लक्ष्य जनहित प्राप्त करना है।
जनहित याचिका का ल्क्ष्य तीव्र तथा सस्ता न्याय एक आम आदमी को दिलवाना तथा कार्यपालिका विधायिका को उनके संवैधानिक कार्य करवाने हेतु किया जाता है।
जनहित याचिका सार्वजानिक हित में काम आती है ना कि व्यक्ति हित में।
जनहित याचिका का दुरूपयोग किया जाये तो याचिकाकर्ता पर जुर्माना तक किया जा सकता है। इनको स्वीकारना या ना स्वीकारना न्यायालय पर निर्भर करता है।
जनहित याचिका राज्य के साथ ही निजी संस्थान के विरूद्ध भी लायी जा सकती है।
जनहित याचिका को लोकहित से प्रेरित कोई भी व्यक्ति,या संगठन इसे ला सकता है।
कोर्ट को अधिकार होगा कि वह इस जनहित याचिका हेतु सामान्य न्यायालय शुल्क भी माफ कर दे।
जनहित याचिका में कोर्ट को दिया गया पोस्टकार्ड भी रिट याचिका मान कर ये जारी की जा सकती है।
जनहित याचिका से जनता में स्वयं के अधिकारों तथा न्यायपालिका की भूमिका के बारे में चेतना बढती है।
जनहित याचिका मौलिक अधिकारों के क्षेत्र को वृहद बनाती है इसमे व्यक्ति को कई नये अधिकार मिल जाते है।
जनहित याचिका कार्यपालिका विधायिका को उनके संवैधानिक कर्तव्य करने के लिये बाधित करती है, साथ ही यह भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन की सुनिशिचतता करती है।

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